
श्री राम सेवा ट्रस्ट की ओर से 16 से 20 अक्टूबर तक आयोजन, प्रतिदिन शाम 7 से 10 बजे तक होगा रामलीला का मंचन
वास्को : प्रभु श्रीराम की भक्ति, आस्था और भारतीय संस्कृति के रंगों से गोवा का वातावरण भक्तिमय हो उठा है। श्री राम सेवा ट्रस्ट, गोवा की ओर से आयोजित प्रथम भव्य रामलीला महोत्सव का शुभारंभ पवित्र कलश यात्रा के साथ हुआ। कलश यात्रा ने आयोजन को आध्यात्मिक शुरुआत दी और श्रद्धालुओं में उत्साह का संचार किया।

रामलीला महोत्सव का आयोजन 16 से 20 अक्टूबर 2026 तक किया जा रहा है। आयोजकों के अनुसार, प्रतिदिन शाम 7 बजे से रात 10 बजे तक प्रभु श्रीराम के जीवन और उनकी लीलाओं का मंचन किया जाएगा। इस आयोजन का उद्देश्य लोगों को भारतीय संस्कृति, धार्मिक परंपराओं और प्रभु श्रीराम के आदर्शों से जोड़ना है।

श्री राम सेवा ट्रस्ट ने सभी राम भक्तों से अपने परिवार, बच्चों, माता-पिता और मित्रों के साथ रामलीला में शामिल होने की अपील की है। ट्रस्ट का कहना है कि यह आयोजन किसी एक संस्था का नहीं, बल्कि सभी राम भक्तों का है। इसका उद्देश्य अधिक से अधिक लोगों को इस सांस्कृतिक और धार्मिक उत्सव से जोड़ना है।
आयोजकों ने बताया कि रामलीला में प्रवेश पूरी तरह निःशुल्क है। कार्यक्रम का स्थल रामलीला ग्राउंड, बिरला मंदिर के सामने, बिट्स पिलानी, गोवा है। आयोजकों ने श्रद्धालुओं से इस आयोजन में शामिल होकर इसे सफल बनाने की अपील की है।
जय श्रीराम के जयघोष के साथ शुरू हुए इस महोत्सव में भक्ति, संस्कृति और परंपरा का संगम देखने को मिल रहा है।


रामलीला का मंचन उत्तर भारत में सदियों पुरानी परंपरा है, जिसकी शुरुआत मुख्य रूप से गोस्वामी तुलसीदास द्वारा रचित महाकाव्य ‘रामचरितमानस’ और महर्षि वाल्मीकि की ‘रामायण’ की कथाओं को जन-जन तक पहुँचाने के लिए हुई थी। किंवदंतियों के अनुसार, रामलीला की परंपरा त्रेता युग या काफी प्राचीन काल से चली आ रही है, जबकि इसका व्यवस्थित और संगठनात्मक मंचन 16वीं शताब्दी में गोस्वामी तुलसीदास की रचना के बाद माना जाता है। काशी (वाराणसी) और अयोध्या को इसके प्रमुख केंद्र माना जाते है। शुरुआत में यह महर्षि वाल्मीकि की रामायण पर आधारित थी, लेकिन बाद में यह गोस्वामी तुलसीदास द्वारा रचित ‘रामचरितमानस’ की चौपाइयों और संवादों पर आधारित हो गई।
इसके पारंपरिक मंचन में सूत्रधार या व्यास होते थे जो रामायण के प्रसंगों का पाठ करते थे, और पात्र उस पर अभिनय या नृत्य करते थे। समय के साथ यह सिर्फ धार्मिक आयोजन न रहकर लोक-नाटक, सामाजिक मेल-जोल, और विजयदशमी का एक बड़ा हिस्सा बन गया। आज लालटेन और खुले मंच से लेकर आधुनिक डिजिटल स्क्रीन, भव्य सेट और फिल्मी कलाकारों तक रामलीला का स्वरूप पहुँच चुका है।
मन यह भी जाता है की 18 वीं सड़ी में रामलीला का मंचन कानपुर से हुआ था .अगर नजर डालें तो राम और रामायण से जुड़ा यहां का सबसे समृद्ध इतिहास नजर आएगा। यहां बिठूर वह स्थान है, जहां महर्षि वाल्मीकि ने रामायण की रचना की। यहीं पर सीता माता ने लव-कुश का लालन-पालन किया। देश भर में शारदीय नवरात्रि के समय रामलीला का मंचन किया जाता है। यानी आजकल देश के कोने-कोने में रामलीला की धूम मची हुई है। शारदीय नवरात्रि के समय रामलीला मंचन की परंपरा सदियों से चली आ रही है।
विदेशों में होनेवाली रामलीला की चर्चा अनिवार्य है . रामलीला अपने देश भारत में ही नहीं, बल्कि बाली, जावा, श्रीलंका जैसे देशों में प्राचीनकाल से ही किसी न किसी रूप में प्रचलित रही है। रामलीला का मंचन नेपाल, थाईलैंड, लाओस, फिजी, दक्षिण अफ्रीका, कनाडा, सूरीनाम, मॉरीशस में भी होता है। थाईलैंड में रामायण को रामाकिआन कहते है। इन दिनों रामलीला का मंचन देखने तो सभी जाते है, पर बहुत कम लोगों को ही यह जानकारी होगी की क्यों इसका मंचन किया जाता हैं।
नवरात्रि में दुर्गा मां के पूजन के साथ ही नौ दिन चलने वाली रामलीला के मंचन का शुभारंभ भी हो जाता है। रामलीला मंचन में मर्यादा पुरुषोत्तम राम के जीवन की प्रमुख घटनाओं को दर्शाया जाता है। दशमी के दिन रावण-वध का मंचन किया जाता है और रावण परिवार के पुतले जलाए जाते हैं।
Author: Goa Samachar
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