
डोना पाऊला: फिल्म हू तू तू की प्रेस कॉन्फ्रेंस थी। सामने तब्बू और नाना पाटेकर बैठे थे। मेरे आगे दिल्ली के कई दिग्गज पत्रकारों की कतार थी और मैं सबसे पीछे खड़ी थी।
छोटे शहर से आई थी, दिल्ली और पत्रकारिता—दोनों मेरे लिए नए थे। भीतर एक झिझक थी, इसलिए आगे जाने की हिम्मत नहीं हो रही थी।
प्रेस कॉन्फ्रेंस शुरू हुई। पत्रकार लगातार सवाल पूछ रहे थे और नाना जवाब दे रहे थे। मेरे मन में भी एक सवाल था। मैंने पीछे से ही हाथ उठाकर सवाल पूछा।
भीड़ के बीच नाना को मेरी आवाज सुनाई दी। उन्होंने अचानक कहा—
“किसकी है इतनी मीठी आवाज? पहले सामने तो आओ … आगे आइए।”
फिर उन्होंने पत्रकारों से कहा कि मुझे आगे आने दें। आगे खड़े पत्रकार दाएं-बाएं हट गए और मेरे लिए बीच में रास्ता बन गया। मैं उस रास्ते से कुछ कदम आगे चलकर सीधे नाना के सामने जा खड़ी हुई।
उन्होंने पूछा—“बोलो , क्या पूछना है?”
मैंने उनसे पूछा कि आप इतने अलग-अलग किरदार निभाते हैं, फिर भी उनकी छवि हमेशा आम आदमी और यथार्थ से जुड़ी रहती है। क्या उन्हें कभी डर नहीं लगता कि यह इमेज उन्हें एक दायरे में बाँध देगी?
नाना ने सहजता से कहा—
“मुझे इमेज से डर नहीं लगता। जो काम मुझे अच्छा लगेगा, वही करूँगा। मैं सिर्फ पैसे के लिए काम नहीं करता। जो मुझे सही लगे और समाज को कुछ अच्छा दे सके, वही करना चाहता हूँ।”
वह मुलाकात कुछ ही मिनटों की थी, लेकिन उसकी सीख मेरे साथ रह गई।
उस दिन नाना ने मुझे सिर्फ पत्रकारों की कतार से आगे नहीं बुलाया था। उन्होंने अनजाने में मुझे अपनी झिझक से आगे बढ़ना सिखाया—अपनी आवाज पर भरोसा करना और भीड़ में अपनी जगह बनाना |
और शायद सबसे बड़ी सीख थी—रियल रहना।
नाना पर्दे पर रील की जिंदगी जीते थे, लेकिन उनका अभिनय और उनका व्यक्तित्व हमेशा जमीन से जुड़ा रहा।
“आगे आइए।” – उनकी वही आवाज कानो में गूँज रही है .
शायद जिंदगी भी यही कहती है—डरिए मत, अपनी आवाज उठाइए और आगे आइए।
अलविदा नाना।
आप पर्दे से विदा हुए हैं, यादों से नहीं।
(जाने-माने अभिनेता नाना पाटेकर का गुरुवार सुबह गोवा के एक निजी अस्पताल में निधन हो गया। उन्हें उनके घर पर अचेत अवस्था में पाया गया था। वे 75 वर्ष के थे।)

प्रस्तुति: नमिता शरण
Author: Goa Samachar
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