
रोशनी वेर्णेकर
मार्सेल :भगवान श्रीकृष्ण की बाल-लीलाओं का अनोखा उत्सव ! गोवा की समृद्ध धार्मिक और सांस्कृतिक परंपरा का प्रतीक माने जाने वाले प्रसिद्ध चिखल कालो उत्सव 2026 का मार्सेल स्थित श्री देवकी कृष्ण मंदिर परिसर में रंगारंग आगाज हुआ। गोवा पर्यटन विभाग और गोवा पर्यटन विकास निगम (जीटीडीसी) के सहयोग से आयोजित तीन दिवसीय इस पारंपरिक उत्सव का उद्घाटन मुख्यमंत्री डॉ. प्रमोद सावंत ने किया। इस अवसर पर केंद्रीय राज्य मंत्री श्रीपद नाईक, पर्यटन मंत्री रोहन खौंटे, राज्यसभा सांसद सदानंद शेट तानावडे, विधायक केदार नाईक, गोविंद गावड़े सहित कई गणमान्य व्यक्ति उपस्थित रहे। उद्घाटन समारोह में आयोजित सांस्कृतिक कार्यक्रमों ने उत्सव के माहौल को और भी जीवंत बना दिया।

तन्वी वालावलकर एवं द हार्ट ऑफ अ जोगन बैंड की ओर से ‘अनुभूति’ सांस्कृतिक कार्यक्रम प्रस्तुत किया गया। इसके बाद राष्ट्रीय पुरस्कार विजेता गायक महेश काले ने ‘अभंगवारी’ कार्यक्रम के तहत अपनी शानदार प्रस्तुति से दर्शकों को मंत्रमुग्ध कर दिया। इस अवसर पर मुख्यमंत्री डॉ. प्रमोद सावंत ने चिखल कालो को गोवा की समृद्ध धार्मिक और सांस्कृतिक विरासत का महत्वपूर्ण हिस्सा बताते हुए कहा कि ऐसे पारंपरिक उत्सव हमारी संस्कृति और परंपराओं को आने वाली पीढ़ियों तक पहुंचाने का कार्य करते हैं। उन्होंने कहा कि चिखल कालो लोगों को प्रकृति, मिट्टी और अपनी जड़ों से जोड़ने के साथ सामाजिक एकता और भाईचारे का संदेश भी देता है। उन्होंने गोवा की धार्मिक एवं सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण और उसे देश-दुनिया तक पहुंचाने पर भी जोर दिया।

उत्सव के दूसरे दिन 25 जुलाई को बच्चों के लिए विभिन्न प्रतियोगिताओं और पारंपरिक खेलों का आयोजन किया गया, जिसमें बच्चों ने पूरे उत्साह के साथ हिस्सा लिया। बच्चों की भागीदारी से मंदिर परिसर का माहौल और भी खुशनुमा हो गया। पारंपरिक खेलों और सांस्कृतिक गतिविधियों के माध्यम से नई पीढ़ी को गोवा की लोक परंपराओं और सांस्कृतिक विरासत से जोड़ने का प्रयास भी किया गया। दिनभर लोगों ने विभिन्न कार्यक्रमों का आनंद लिया और उत्सव स्थल पर उत्साह का माहौल बना रहा। तीन दिवसीय उत्सव का सबसे बड़ा आकर्षण मार्सेल में आस्था, परंपरा और उत्साह का अनोखा संगम देखने को मिलता है । बच्चे, युवा और बुजुर्ग बड़ी संख्या में मिट्टी और कीचड़ में उतरकर पारंपरिक खेलों में हिस्सा लेते है । हुड्डुत (कबड्डी), अंधली पाखली (आंख-मिचौनी), विटी दांडू (गिल्ली-डंडा), दही-कांदो/मटकी फोड़ जैसे पारंपरिक खेल इस आयोजन के प्रमुख आकर्षण है । कीचड़ में सने प्रतिभागी एक-दूसरे पर मिट्टी डालते हुए खेलों का आनंद लेते है , जिससे पूरा वातावरण हंसी-मजाक, उमंग और उत्साह से भर उठेगा।


स्थानीय मान्यताओं और इतिहासकारों के अनुसार चिखल कालो की परंपरा लगभग 400 से 450 वर्ष पुरानी मानी जाती है। इसका संबंध मार्सेल स्थित श्री देवकी कृष्ण मंदिर और भगवान श्रीकृष्ण की बाल-लीलाओं से जोड़ा जाता है। धार्मिक मान्यता है कि द्वादशी के दिन भगवान श्रीकृष्ण बाल रूप में अपने भक्तों के साथ खेलने आते हैं। इसी आस्था के चलते श्रद्धालु मिट्टी और कीचड़ में उतरकर भगवान कृष्ण की बाल-लीलाओं को प्रतीकात्मक रूप से जीवंत करते हैं। चिखल कालो की शुरुआत को लेकर एक स्थानीय ऐतिहासिक मान्यता भी प्रचलित है।
माना जाता है कि 16वीं शताब्दी में पुर्तगाली शासन के दौरान जब गोवा में मंदिरों को नुकसान पहुंचाया जा रहा था, तब भगवान देवकी कृष्ण की मूर्ति को सुरक्षित रखने के लिए चोराव द्वीप से मार्सेल लाया गया था। इसके बाद मार्सेल में भगवान देवकी कृष्ण के प्रति लोगों की आस्था और मजबूत हुई। स्थानीय देवस्थान समिति, किसान और गांवकर समुदाय ने भगवान कृष्ण की बाल-लीलाओं की स्मृति में इस पारंपरिक खेल को आगे बढ़ाया, जो धीरे-धीरे चिखल कालो उत्सव के रूप में प्रसिद्ध हो गया। स्थानीय किसान समुदाय के लिए भी इस उत्सव का विशेष महत्व माना जाता है। मानसून के मौसम में खेती और बुवाई से पहले मिट्टी और प्रकृति के प्रति आभार व्यक्त करने की परंपरा को चिखल कालो से जोड़कर देखा जाता है। इस वजह से यह उत्सव धार्मिक आस्था के साथ-साथ गोवा की ग्रामीण और कृषि संस्कृति की झलक भी प्रस्तुत करता है। चिखल कालो की सबसे खास बात यह है कि इसमें सामाजिक भेदभाव की कोई जगह नहीं होती। समाज के अलग-अलग वर्गों के लोग एक साथ कीचड़ में उतरकर उत्सव मनाते हैं और एक-दूसरे के साथ खुशियां बांटते हैं। खेलने से पहले नारियल तेल लगाया जाता है इस तरह यह उत्सव सामाजिक सद्भाव, एकता और भाईचारे का भी संदेश देता है। वहीं, इस धार्मिक परंपरा में गोपालकाला का भी विशेष महत्व है। एकादशी के व्रत के बाद द्वादशी के दिन विभिन्न खाद्य पदार्थों को मिलाकर गोपालकाला तैयार किया जाता है और इसे प्रसाद के रूप में आपस में बांटकर ग्रहण किया जाता है। यह परंपरा भगवान श्रीकृष्ण की बाल-लीलाओं और सामूहिकता का प्रतीक मानी जाती है। चिखल कालो उत्सव की यही विशेषता इसे अन्य आयोजनों से अलग पहचान देती है। यह उत्सव धर्म, प्रकृति, मिट्टी, कृषि, लोक संस्कृति और सामाजिक एकता को एक साथ जोड़ता है। तीन दिवसीय उत्सव के पहले दिन भव्य उद्घाटन और सांस्कृतिक कार्यक्रमों ने लोगों को आकर्षित किया, जबकि दूसरे दिन बच्चों की प्रतियोगिताओं और पारंपरिक खेलों ने उत्साह बढ़ाया। अब 26 जुलाई को होने वाला मुख्य चिखल कालो इस पूरे आयोजन का सबसे बड़ा आकर्षण होगा। बारिश से भीगी मार्सेल की धरती पर जब बच्चे, युवा और बुजुर्ग मिट्टी और कीचड़ में उतरेंगे, तब वहां केवल एक खेल नहीं, बल्कि भगवान श्रीकृष्ण की बाल-लीलाओं, सदियों पुरानी परंपरा और गोवा की जीवंत सांस्कृतिक विरासत का अनोखा उत्सव देखने को मिलेगा। फोटो : रोशनी वेर्णेकर
Author: Goa Samachar
GOA SAMACHAR (Newspaper in Rajbhasha ) is completely run by a team of woman and exemplifies Atamanirbhar Bharat, Swayampurna Goa and women-led development.













