जहां मिट्टी में बसती है बप्पा की तस्वीर, पीढ़ियों से गणपति की शालाओं में जिंदा है गोवा की कला

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रोशनी रामदास वर्णेकर की रिपोर्ट

रोशनी रामदास वर्णेकर की रिपोर्ट

फोंडा: कहीं मिट्टी गूंथी जा रही है, कहीं गणपति की सूंड को आकार दिया जा रहा है, तो कहीं बप्पा के मुकुट और आंखों को अंतिम रूप दिया जा रहा है। गणेश चतुर्थी आने में अभी समय है, लेकिन गोवा की गणपति शालाओं में उत्सव की तैयारी शुरू हो चुकी है। इन शालाओं में कारीगरों के हाथ दिन-रात चल रहे हैं। मिट्टी के एक साधारण ढेले से शुरू होने वाली यह मेहनत कुछ दिनों बाद गणपति बप्पा की सुंदर प्रतिमा का रूप लेती है।
गोवा की इन शालाओं की खास बात यह है कि यहां केवल गणपति की प्रतिमाएं ही नहीं बनतीं। गणेश चतुर्थी से पहले आने वाले कृष्ण जन्माष्टमी और नागपंचमी के लिए भी भगवान कृष्ण और नाग की प्रतिमाएं यहीं तैयार की जाती हैं। यानी त्योहार कोई भी हो, इन कारीगरों के हाथों में मिट्टी का रूप बदलता रहता है और श्रद्धा को आकार मिलता रहता है।
इन शालाओं में काम करने वाले कई मूर्तिकारों के लिए यह सिर्फ कमाई का साधन नहीं है। यह उनके परिवार की पहचान है। रोहित वरेकर, बाळू जैसे कई मूर्तिकार वर्षों से गणपति की मूर्तियां बना रहे हैं। उनके परिवार में यह कला करीब 1970 से चली आ रही है। उनके दादा के समय से शुरू हुआ यह काम अब अगली पीढ़ी तक पहुंच चुका है। जिस कला को कभी घर के बड़े-बुजुर्गों ने अपने हाथों से सीखा था, आज वही कला उनके बच्चे और युवा आगे बढ़ा रहे हैं।

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गणपति की प्रतिमा तैयार करना देखने में जितना आसान लगता है, असल में उतना ही मेहनत वाला काम है। मिट्टी को सही तरीके से तैयार करने से लेकर प्रतिमा का ढांचा बनाने, चेहरे के भाव उकेरने, हाथ-पैर और आभूषणों का आकार देने और अंत में रंग भरने तक हर चरण में कारीगर की बारीकी काम आती है। बप्पा की आंखों और चेहरे के भावों में थोड़ी भी गलती पूरी प्रतिमा का रूप बदल सकती है।

रोशनी रामदास वर्णेकर की रिपोर्ट
सबसे खूबसूरत बात यह है कि इस काम में अब गांव के बच्चे और युवा भी अपनी रुचि दिखा रहे हैं। कोई मिट्टी तैयार करने में मदद करता है, कोई छोटी प्रतिमाओं को आकार देने में हाथ बंटाता है, तो कोई रंग और सजावट के काम में मदद करता है। उनके लिए यह केवल मदद नहीं, बल्कि अपने बुजुर्गों से अपनी परंपरा सीखने का मौका भी है। इस तरह एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक मूर्तिकला का यह हुनर पहुंच रहा है।
मिट्टी की मूर्ति से दोहरा फायदा
इस बार गणेशोत्सव को पर्यावरण के अनुकूल बनाने पर भी जोर दिया जा रहा है। CM ने लोगों से चिकनी मिट्टी से बनी पारंपरिक गणपति प्रतिमाएं खरीदने की अपील की है। उनका कहना है कि स्थानीय मूर्तिकारों से मिट्टी की प्रतिमाएं खरीदने से पर्यावरण की रक्षा के साथ-साथ स्थानीय कारीगरों को भी सीधा लाभ मिलेगा।
पर्यावरण के लिए नुकसानदायक पीओपी की मूर्तियों पर सरकार ने रोक लगाई है। CM ने कहा कि नियमों के बावजूद कुछ जगहों पर पीओपी की मूर्तियां खरीदी-बेची जा रही हैं। ऐसे मामलों में कार्रवाई की जा रही है। उन्होंने लोगों से भी अपील की कि वे पीओपी की जगह मिट्टी की मूर्तियों को प्राथमिकता दें।
यह अपील इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि एक मिट्टी की गणपति प्रतिमा खरीदना केवल पर्यावरण के लिए बेहतर विकल्प चुनना नहीं है। इससे उस मूर्तिकार के घर की कमाई भी जुड़ी है, जिसने कई दिनों तक मेहनत करके बप्पा को आकार दिया है। स्थानीय कारीगरों को बढ़ावा मिलने से पीढ़ियों से चली आ रही यह कला भी सुरक्षित रह सकती है।
कारीगरों को आत्मनिर्भर बनाने पर जोर
सरकार की ओर से पारंपरिक कारीगरों को प्रशिक्षण देने पर भी जोर दिया जा रहा है। CM के अनुसार, आत्मनिर्भरता को बढ़ावा देने के लिए 2025 से अब तक 52 कार्यशालाएं आयोजित की गई हैं, जिनमें करीब 6 हजार कारीगरों को प्रशिक्षण दिया गया है। इसका उद्देश्य केवल उन्हें नया हुनर सिखाना नहीं, बल्कि उनके पारंपरिक काम को बाजार और रोजगार से जोड़ना भी है।
गोवा में गणपति की शालाओं का यह दृश्य इसलिए खास है क्योंकि यहां एक प्रतिमा के साथ कई कहानियां जन्म लेती हैं। किसी मूर्तिकार के लिए यह उसके दादा की विरासत है, किसी बच्चे के लिए अपने परिवार का हुनर सीखने की शुरुआत और किसी परिवार के लिए त्योहार के मौसम में मिलने वाला रोजगार।
जब गणेश चतुर्थी पर यही प्रतिमाएं घरों और सार्वजनिक पंडालों में विराजेंगी, तब शायद बहुत कम लोग सोचेंगे कि बप्पा के उस सुंदर रूप के पीछे कितने दिनों की मेहनत छिपी है। लेकिन गोवा की इन शालाओं में आज भी हर प्रतिमा के साथ मिट्टी में हाथ, आंखों में सपना और दिल में बप्पा के प्रति श्रद्धा दिखाई देती है।
यही वजह है कि गोवा की गणपति शालाएं सिर्फ मूर्ति बनाने की जगह नहीं हैं। वे कला, रोजगार, पर्यावरण और पीढ़ियों से चली आ रही आस्था को एक साथ जोड़ने वाली छोटी-छोटी कार्यशालाएं हैं, जहां हर साल मिट्टी से सिर्फ गणपति नहीं, बल्कि एक पूरी परंपरा दोबारा जन्म लेती है।

सभी चित्र : रोशनी वर्णेकर

Goa Samachar
Author: Goa Samachar

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