
कैंडोलिम : पद्मश्री शीन काफ निज़ाम, एक जाने-माने उर्दू कवि और साहित्यकार हैं। प्रभा खेतान फ़ाउंडेशन ने गोवा में सुर और साज़ के पहले संस्करण का आयोजन 6 अगस्त 2026 को हिल्टन रिसॉर्ट, कैंडोलिम , गोवा में किया । इस आत्मीय संध्या में साहित्य और शायरी से प्रेम करने वाले 50 चुनिंदा श्रोता, पद्मश्री सम्मानित प्रख्यात शायर एवं साहित्यकार शीन काफ़ निज़ाम से रूबरू हुए।
श्रीमती वैशाली जोशी के आत्मीय स्वागत वक्तव्य ने शाम की एक सुंदर भूमिका रची। इसके बाद “रस्ता ये कहीं नहीं जाता” शीर्षक से शीन काफ़ निज़ाम साहब और श्रीमती श्रुति जयसवाल जुवारकर के बीच संवाद आरम्भ हुआ। यह एक पारंपरिक साहित्यिक साक्षात्कार से आगे बढ़कर उस मनुष्य तक पहुँचने की कोशिश थी, जिसकी संवेदनाओं से उनकी शायरी जन्म लेती है।

निज़ाम साहब ने कला में संकेत और संयम के सौंदर्य पर बात करते हुए कहा कि कई बार अनकहा, कहे हुए से अधिक गहरा अर्थ रखता है। उन्होंने बड़ी सहजता से ग़ज़ल और नज़्म के बीच का अंतर समझाया, जिससे इन विधाओं की बारीकियाँ अनुभवी पाठकों के साथ नए श्रोताओं के लिए भी सरल और रोचक बन गईं।
अपने जन्म नाम शिव किशन बिस्सा से शीन काफ़ निज़ाम बनने की यात्रा को उन्होंने रचनात्मक आत्म-अभिव्यक्ति और कलात्मक विद्रोह का एक रूप बताया। इसी संदर्भ में बातचीत उस बेचैनी और प्रश्नाकुलता तक पहुँची, जो अक्सर एक कलाकार के भीतर उसकी तलाश को जीवित रखती है।

शाम का एक अत्यंत यादगार क्षण तब आया, जब उनसे शायरों के बारे में प्रचलित ग़लतफ़हमियों पर प्रश्न किया गया। निज़ाम साहब ने कहा कि कभी-कभी खोए रहना भी एक कला है। शायर वह है जो अपनी तलाश में बना रहता है, जो किसी अंतिम उत्तर तक पहुँचने की जल्दी में नहीं होता। क्योंकि जिस दिन उसकी तलाश पूरी हो जाए, शायद उसके भीतर का कलाकार भी कुछ हद तक ठहर जाए।

कार्यक्रम की शुरुआत एक सलीके से सजाए गए हाई-टी से हुई। अतिथियों के लिए ओपन एवोकाडो टोस्ट सैंडविच, स्पिनच एंड कॉर्न क्विश, मूंग दाल टिक्की स्लाइडर, स्प्राउट्स चाट, बनाना एंड ओटमील मफिन्स, तंदूरी चिकन सीख रोल, मसाला चाय और कॉफी जैसे विविध व्यंजन प्रस्तुत किए गए।
निज़ाम साहब ने सुनने की कला पर भी एक गहरी बात रखी। उनके अनुसार बच्चों को बोलना सिखाने से पहले सुनना सिखाया जाना चाहिए। भाषा के कई स्वर और सही उच्चारण समय के साथ हमारे व्यवहार से ओझल होते जा रहे हैं। इसलिए भाषा तक पहुँचने का रास्ता केवल ज्ञान नहीं, बल्कि एहसास, ध्यान और इंसानी जुड़ाव भी है।

प्रश्नोत्तर और रूहानी तरन्नुम के साथ संवाद अपने समापन तक पहुँचा। श्रीमती नीलिमा मोराजकर ने निज़ाम साहब का सम्मान किया तथा श्रीमती श्रुति जयसवाल जुवारकर ने धन्यवाद ज्ञापन प्रस्तुत किया। इस अवसर पर मेघालय का हस्तनिर्मित लिविंग रूट ब्रिज स्मृति-चिह्न के रूप में भेंट किया गया। यह कलाकृति धैर्य, सामंजस्य और उन पुलों का प्रतीक है, जो कला भाषाओं, संस्कृतियों और इंसानी दिलों के बीच बनाती है।

इस विशेष आयोजन को एहसास वूमेन ऑफ़ गोवा, श्रीमती गौरप्रिया पाई-काणे, श्रीमती वैशाली जोशी और श्रीमती श्रुति जयसवाल जुवारकर के सामूहिक प्रयासों ने संभव बनाया। उनके सहयोग और दृष्टि से प्रभा खेतान फाउंडेशन का यह विशिष्ट साहित्यिक अनुभव गोवा तक पहुँचा।
श्रोता संवाद में इतने तल्लीन थे कि कई लोगों ने सत्र का समय बढ़ाने का आग्रह किया। औपचारिक कार्यक्रम समाप्त होने के बाद भी अतिथि निज़ाम साहब के आसपास एकत्र रहे और उनके विचारों के अर्थ तलाशते हुए बातचीत करते रहे। इस तरह एक साहित्यिक आयोजन, शायरी, चिंतन और मानवीय जुड़ाव के साझा अनुभव में बदल गया।
Author: Goa Samachar
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