हमेशा मजबूत दिखने का दबाव: महिलाओं की अनकही थकान

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अदीति मल्होत्रा- लेखिका | बिज़नेसवुमन | लाइफस्टाइल इन्फ्लुएंसर

सुबह का समय है। अलार्म बजता है और एक और दिन की शुरुआत हो जाती है। आँखें खुलती हैं, लेकिन मन पूरी तरह जागा हुआ नहीं होता। फिर भी दिन रुकता नहीं है। रसोई का काम, घर की जिम्मेदारियाँ, बच्चों की जरूरतें, ऑफिस की तैयारियाँ, फोन कॉल्स, मैसेजेस, और इन सबके बीच खुद के लिए समय लगभग न के बराबर। यह किसी एक महिला की कहानी नहीं है, बल्कि हमारे आसपास हर घर में जी जा रही एक सच्चाई है।

हमारी समाज में महिलाओं को बचपन से एक बात बहुत गहराई से सिखाई जाती है कि उन्हें मजबूत बनना है। रोना नहीं है, हार नहीं माननी है, और हर परिस्थिति में खुद को संभालना है। धीरे-धीरे यह सीख एक आदत बन जाती है और फिर एक उम्मीद में बदल जाती है। यह उम्मीद सिर्फ दूसरों की नहीं होती, बल्कि महिला खुद से भी यही अपेक्षा करने लगती है कि उसे हर हाल में ठीक रहना है।

तारीफ के पीछे छुपा दबाव अक्सर महिलाओं को कहा जाता है कि तुम तो बहुत स्ट्रॉन्ग हो, तुम सब संभाल लोगी। यह सुनने में एक तारीफ लगती है, लेकिन इसके साथ एक जिम्मेदारी भी जुड़ जाती है। यह एक ऐसा वाक्य है जो धीरे-धीरे महिला के मन में बैठ जाता है और फिर वह खुद भी यही मानने लगती है कि उसे हर परिस्थिति में मजबूत ही रहना है। फिर चाहे तबीयत ठीक न हो, मन भारी हो, या हालात कठिन हों, महिला अपने आप से यही कहती है कि उसे ही सब संभालना है। क्योंकि अगर वह नहीं संभालेगी, तो कौन संभालेगा। इसी सोच के साथ वह लगातार आगे बढ़ती रहती है, बिना रुके, बिना शिकायत किए। यहीं से शुरू होती है वह अनकही थकान, जो बाहर से दिखाई नहीं देती, लेकिन भीतर गहराई से महसूस होती है।

हर भूमिका में परफेक्ट बनने की कोशिश आज की महिला एक साथ कई भूमिकाएँ निभा रही है। वह घर की देखभाल भी करती है, अपने करियर को भी संभालती है, रिश्तों को भी निभाती है और हर जगह अपनी जिम्मेदारी पूरी करने की कोशिश करती है। लेकिन इन सबके बीच एक बहुत जरूरी सवाल कहीं खो जाता है कि वह खुद कैसी है।हर भूमिका में परफेक्ट होने की कोशिश इस थकान को और बढ़ा देती है। घर में सब खुश रहें, बच्चों को कभी कमी महसूस न हो, काम में कोई गलती न हो, और बाहर से सब कुछ संतुलित दिखे, यह सब एक साथ निभाना आसान नहीं होता। लेकिन फिर भी महिलाएँ इसे निभाती हैं, अक्सर बिना किसी ब्रेक के। वह थकती हैं, लेकिन रुकती नहीं हैं। वह परेशान होती हैं, लेकिन दिखाती नहीं हैं।

“मैं ठीक हूँ” की आदत कई बार ऐसा होता है कि जब कोई पूछता है कि आप कैसी हैं, तो जवाब बहुत सहजता से आता है कि मैं ठीक हूँ। यह जवाब इतना आम हो गया है कि अब यह एक सच से ज्यादा एक आदत बन चुका है। जबकि अंदर से सब कुछ ठीक नहीं होता।भावनाएँ होती हैं, तनाव होता है, उलझनें होती हैं, लेकिन उन्हें व्यक्त करना आसान नहीं होता। क्योंकि कहीं न कहीं यह डर होता है कि अगर अपनी कमजोरी दिखा दी, तो लोग क्या सोचेंगे। धीरे-धीरे महिला अपनी ही भावनाओं को दबाने लगती है और यही दबाव उसके मन को और थका देता है।

मेंटल थकान जो दिखाई नहीं देती शारीरिक थकान को हम आसानी से पहचान लेते हैं, लेकिन मानसिक थकान को अक्सर नजरअंदाज कर देते हैं। दिन भर के छोटे-छोटे फैसले, लगातार चलने वाली जिम्मेदारियाँ, और हर किसी की चिंता करना, यह सब मिलकर एक ऐसी थकान बनाते हैं जो धीरे-धीरे भीतर जमा होती रहती है।

गोवा जैसे शहर में, जहाँ बाहर से जीवन बहुत शांत और सुकून भरा नजर आता है, वहाँ भी महिलाओं की यह थकान उतनी ही वास्तविक है। समुद्र की लहरें, खुला आसमान और धीमी रफ्तार वाली जिंदगी के बावजूद, घर और काम की जिम्मेदारियाँ कम नहीं होतीं। बाहर की शांति अंदर की जिम्मेदारियों को पूरी तरह खत्म नहीं कर पाती।

सोशल मीडिया और तुलना का दबाव आज के समय में सोशल मीडिया ने इस दबाव को और बढ़ा दिया है। हर तरफ एक परफेक्ट जीवन की तस्वीर दिखाई जाती है। परफेक्ट घर, परफेक्ट दिखने वाली महिलाएँ, खुशहाल परिवार और हमेशा मुस्कुराते हुए चेहरे।इसे देखकर अनजाने में एक तुलना शुरू हो जाती है। ऐसा लगने लगता है कि शायद हम कुछ कम कर रहे हैं या उतने अच्छे नहीं हैं जितना होना चाहिए। यह तुलना धीरे-धीरे आत्मविश्वास को प्रभावित करती है और मानसिक थकान को और गहरा कर देती है। हम यह भूल जाते हैं कि जो दिखता है, वह पूरी सच्चाई नहीं होता।

खुद के लिए समय निकालना क्यों जरूरी है हम अक्सर दूसरों के लिए समय निकाल लेते हैं, लेकिन खुद के लिए रुकना हमें मुश्किल लगता है। जबकि सच यह है कि खुद के लिए समय निकालना कोई लक्जरी नहीं, बल्कि एक जरूरत है।यह समय बहुत बड़ा नहीं होना चाहिए। दिन में कुछ मिनट भी काफी होते हैं, अगर वह पूरी तरह अपने लिए हों। एक कप चाय के साथ कुछ पल की शांति, अपनी पसंद का कोई गाना सुनना, या बस कुछ देर बिना किसी काम के बैठना, यह सब छोटे-छोटे तरीके हैं जो मन को हल्का कर सकते हैं।जब हम खुद को थोड़ा समय देते हैं, तो हम खुद से फिर से जुड़ पाते हैं। और यही जुड़ाव हमें अंदर से मजबूत बनाता है।

मजबूती की नई परिभाषा अब शायद समय आ गया है कि हम मजबूत होने की परिभाषा को थोड़ा बदलें। मजबूत होने का मतलब यह नहीं है कि हम कभी थकें नहीं या कभी रोएं नहीं। मजबूत होने का असली अर्थ यह है कि हम अपनी भावनाओं को समझें और उन्हें स्वीकार करें।कभी यह कहना कि आज मैं ठीक नहीं हूँ, यह भी एक तरह की ताकत है। कभी मदद मांगना भी कमजोरी नहीं बल्कि समझदारी है। खुद को प्राथमिकता देना, खुद को समझना और खुद का ख्याल रखना, यह सब उसी मजबूती का हिस्सा है जिसके बारे में हम अक्सर बात नहीं करते।

हर महिला के अंदर एक अद्भुत क्षमता होती है, इसमें कोई शक नहीं है। लेकिन वह भी इंसान है। उसे भी आराम की जरूरत होती है, उसे भी सहारे की जरूरत होती है, और उसे भी यह महसूस होने की जरूरत होती है कि वह अकेली नहीं है।शायद हमें अब यह समझने की जरूरत है कि हर समय मजबूत दिखना जरूरी नहीं है। कभी-कभी रुक जाना, थोड़ा थक जाना, और खुद को संभालने के लिए समय लेना भी उतना ही जरूरी है।क्योंकि असली मजबूती शायद इसी में है कि हम अपने आप को सुनें, समझें और बिना किसी अपराधबोध के अपने लिए भी जिएं।

Goa Samachar
Author: Goa Samachar

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