आर्टीक्विंटा में कला से जीवंत हुई 75 साल पुरानी विरासत

सांगोल्डा : यह एक कलात्मक पहल है जो पारिवारिक विरासत का जश्न मनाती है। इसमें समकालीन कलाकारों की कूची के ज़रिए 1950 की एक यादगार वस्तु को सहेज कर रखा गया है।
आर्टीक्विंटा में आयोजित ‘द आर्ट ऑफ़ एडिशन’ (The Art of Edition) प्रदर्शनी में इतिहास, विरासत और कलात्मक अभिव्यक्ति का एक सुंदर संगम देखने को मिलता है। यहाँ 75 साल पुराने बक्सों को कला के एक अनोखे नमूने में बदल दिया गया है, जो पीढ़ियों से जुड़ी एक बेहद निजी कहानी को अपने भीतर समेटे हुए है। यह खूबसूरत परिकल्पना को साकार किया सामाजिक कार्यकर्ता और फिलांथ्रोपिस्ट रीना राव ने।
यह बक्सा 1950 में बनारस से पटना आया था। यह उस समय माँ की शादी के उपहार के सामान का हिस्सा था—ऐसे कुल 101 बक्से थे। परिवार की इस अनमोल विरासत को सहेजने के लिए, उन्होंने ने इसे कला के ज़रिए एक नया रूप देने का विचार किया और इसके लिए उन्होंने एक कलाकार को हर बक्से पर अलग-अलग चित्रकारी करने का काम सौंपा।
यह पहल निजी यादों और रचनात्मक अभिव्यक्ति को एक साथ लाती है, जिससे भावनात्मक महत्व वाली एक वस्तु इतिहास के एक जीवंत हिस्से में बदल जाती है। हर पेंट किए गए बक्से पर उसके आने का साल, चित्रकारी की शैली, कलाकार के हस्ताक्षर और वर्ष 2026 अंकित है। यह अतीत और वर्तमान के बीच एक सार्थक संबंध बनाता है।


यह केवल एक कलात्मक प्रयोग नहीं है, बल्कि यह दिखाता है कि कैसे रचनात्मकता के ज़रिए पारिवारिक विरासतों को सहेजा और नए रूप में पेश किया जा सकता है। हर बक्सा एक कहानीकार बन जाता है, जो अपने भीतर एक बीते दौर की यादों, परंपराओं और भावनाओं को संजोए रखता है।


यह प्रदर्शनी दर्शकों को कला और निजी इतिहास के बीच के रिश्ते को समझने का मौका देती है। यह दिखाती है कि विरासत को केवल पुरानी तस्वीरों या पारिवारिक अभिलेखों तक ही सीमित रहने की ज़रूरत नहीं है; इसे समकालीन कलात्मक तरीकों से नए अर्थ दिए जा सकते हैं और इसका जश्न मनाया जा सकता है।

आर्टीक्विंटा में यह प्रदर्शनी जारी है। यहाँ कला प्रेमी और दर्शक इस अनोखे संग्रह को देख सकते हैं और यादों, विरासत तथा नए रूप में ढलने की कहानियों का अनुभव कर सकते हैं।

रीना राव को इस पहल में उनके पति किशोर राव का भी महत्वपूर्ण सहयोग मिला है। किशोर राव पेरिस स्थित यूनेस्को मुख्यालय के विश्व धरोहर केंद्र के पूर्व निदेशक रह चुके हैं।




इस कलात्मक पहल की पृष्ठभूमि में वैशाली ठक्कर का भी अहम योगदान है। वर्ष 1999 में वैशाली ठक्कर ने ‘विजुअल आर्ट यूके’ की स्थापना एक सरल लेकिन दूरदर्शी उद्देश्य के साथ की थी—भारतीय कला को भारत की सीमाओं से परे अंतरराष्ट्रीय दर्शकों तक पहुँचाना।
परिवार की एक छोटी-सी गैलरी के रूप में शुरू हुई यह पहल धीरे-धीरे प्रदर्शनियों, कला संग्रहकर्ताओं और कलाकारों के लिए एक महत्वपूर्ण मंच बन गई। वर्षों के दौरान विकसित हुए इन संबंधों ने भारतीय कला को व्यापक पहचान दिलाने में योगदान दिया। वैशाली ठक्कर की इसी कला-दृष्टि और विरासत की झलक आर्टीक्विंटा में आयोजित कला प्रदर्शनी में भी देखने को मिलती है।
Author: Goa Samachar
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