
लेखक: डॉ. अनिल प्रताप सिंह
संस्थापक, ग्लोबल साइंस एकेडमी, बस्ती, उत्तर प्रदेश स्टेट हेड, मुंसिफ टीवी, उत्तर प्रदेश ईमेल:
सह-लेखिका : आशा वर्नेकर
सह-संस्थापक, गोवा लाइवलीहुड फोरम (PM अवॉर्डी)

एक ऐतिहासिक दहलीज: 17 जनवरी 2026 का महत्व
17 जनवरी, 2026 की तिथि वैश्विक कूटनीति और पर्यावरण संरक्षण के इतिहास में एक स्वर्णिम अध्याय के रूप में अंकित होने जा रही है। आज मानवता एक ऐसे निर्णायक मोड़ पर खड़ी है जहाँ हमारे पास दो विकल्प हैं: या तो हम शासन की कमी और पारिस्थितिक विनाश के पुराने मार्ग पर चलते रहें, या फिर समानता, स्थिरता और साझा समृद्धि पर आधारित एक नए वैश्विक समझौते को अंगीकार करें। संयुक्त राष्ट्र (UN) के तत्वावधान में लगभग दो दशकों की मैराथन वार्ताओं और गहन कूटनीतिक विमर्श के बाद BBNJ (Biodiversity Beyond National Jurisdiction) समझौता क्रियान्वित हो रहा है। अंतरराष्ट्रीय मंचों पर इसे ‘ओशन लॉ 2026’ के नाम से पुकारा जा रहा है।
भारत के लिए यह मात्र एक कानूनी उपलब्धि नहीं है, बल्कि यह हमारी उस पुरातन सभ्यतागत सोच का आधुनिक साकार रूप है जो ‘गहन समुद्री क्षेत्रों’ को ‘संपूर्ण मानवता की साझा धरोहर’ (Common Heritage of Humankind) मानती है। पृथ्वी के महासागरों का वह 64 प्रतिशत विशाल हिस्सा, जो किसी भी राष्ट्र की अनन्य आर्थिक क्षेत्र (EEZ) की सीमा से बाहर है, अब तक एक तरह से लावारिस और असुरक्षित था। ‘ओशन लॉ 2026’ के लागू होने से यह विशाल क्षेत्र अंतरराष्ट्रीय कानून के संरक्षण में आ जाएगा। यह संधि विकसित और विकासशील राष्ट्रों के बीच मौजूद ऐतिहासिक और तकनीकी खाई को पाटने का एक क्रांतिकारी माध्यम बनेगी।
अटल दृष्टि: नीली अर्थव्यवस्था की नींव
वर्तमान भारत की विकास यात्रा में ‘ब्लू इकोनॉमी’ एक मजबूत आधार स्तंभ बनकर उभरी है। इस समुद्री चेतना का बीजारोपण भारत रत्न श्री अटल बिहारी वाजपेयी जी के दूरदर्शी नेतृत्व में हुआ था। उन्होंने दशकों पहले यह पहचान लिया था कि भारत की समृद्धि का मार्ग हिमालय से नहीं, बल्कि हिंद महासागर की लहरों से होकर गुजरता है। उन्होंने समुद्र को मात्र एक जलराशि या सीमा नहीं, बल्कि भारत की ‘द्वितीय सामरिक सीमा’ (Second Frontier) के रूप में परिभाषित किया था।
वर्ष 2003 में उनके द्वारा प्रस्तुत ‘सागरमाला’ परियोजना ने समुद्री बुनियादी ढांचे और बंदरगाहों के आधुनिकीकरण को राष्ट्रीय विमर्श के केंद्र में ला दिया। वाजपेयी जी ने ही ‘महासागर विकास विभाग’ की स्थापना की थी, जिसने पहली बार अंतरराष्ट्रीय समुद्रों में भारत की वैज्ञानिक उपस्थिति और धाक जमाई। उनका अटूट विश्वास था कि 21वीं सदी भारत की होगी और इसकी शक्ति समुद्रों से संचालित होगी। आज का ‘डीप ओशन मिशन’ उन्हीं के सपनों का एक परिष्कृत विस्तार है, जो भारत को हिंद-प्रशांत क्षेत्र में एक प्रमुख आर्थिक शक्ति और भरोसेमंद सुरक्षा प्रदाता (Net Security Provider) के रूप में विश्व पटल पर स्थापित करता है।
वैश्विक समानता: ‘ग्लोबल साउथ’ का सशक्तिकरण
‘ओशन लॉ 2026’ की सबसे क्रांतिकारी उपलब्धि वैश्विक उत्तर (Global North) और वैश्विक दक्षिण (Global South) के बीच संसाधनों का न्यायपूर्ण वितरण है। ऐतिहासिक रूप से, अमीर देशों के पास गहरे समुद्र की जटिल खोज के लिए आवश्यक तकनीक और वित्तीय पूंजी रही है, जबकि विकासशील देश उस जैव-विविधता के मूक रक्षक रहे हैं जो दुनिया के पारिस्थितिकी तंत्र को संतुलित करती है। लंबे समय तक यह स्थिति ‘बायोपायरेसी’ और संसाधनों के अनुचित दोहन का कारण बनी रही।
भारत ने निरंतर ‘ग्लोबल साउथ’ की मुखर आवाज बनकर इस बात को सिद्ध किया है कि समुद्र किसी विशेष देश की निजी जागीर नहीं है। यह कानून एक मूलभूत सत्य को स्वीकार करता है: यदि विकसित राष्ट्रों के पास ‘नवाचार का इंजन’ (Innovation Engine) है, तो विकासशील राष्ट्रों के पास ‘जैविक बैंक’ (Biological Bank) है। नए ढांचे के तहत, समुद्री आनुवंशिक संसाधनों से प्राप्त होने वाले लाभों (जैसे दवाएं और तकनीक) का उचित साझाकरण अब कोई विकल्प नहीं बल्कि एक कानूनी अनिवार्यता है। यह ‘डिजिटल डिवाइड’ को समाप्त कर एक ‘सहयोगात्मक सेतु’ (Collaborative Bridge) बनाने की दिशा में सबसे बड़ा कदम है।
मानव विकास सूचकांक (HDI) पर व्यापक प्रभाव
महासागर मानवता के विकास के मौन इंजन हैं। ‘ओशन लॉ 2026’ सीधे तौर पर मानव विकास सूचकांक (HDI) के तीन मुख्य घटकों को सशक्त बनाता है:
1. स्वास्थ्य और जीवन प्रत्याशा: समुद्री पारिस्थितिकी तंत्र न केवल जलवायु को नियंत्रित करते हैं, बल्कि दुनिया के 3 अरब से अधिक लोगों के लिए प्रोटीन का प्राथमिक स्रोत भी हैं। समुद्र का संरक्षण वैश्विक खाद्य सुरक्षा और भविष्य की महामारियों से लड़ने के लिए नई दवाओं की खोज की गारंटी है।
2. शिक्षा और ज्ञान का लोकतंत्रीकरण: यह कानून ‘महासागरीय साक्षरता’ (Ocean Literacy) को बढ़ावा देता है। यह स्वदेशी और पारंपरिक ज्ञान को पश्चिमी विज्ञान के समकक्ष दर्जा देता है, जिससे सदियों से उपेक्षित तटीय समुदायों को गौरव और सशक्तिकरण प्राप्त होता है।
3. आर्थिक स्वावलंबन: नीली अर्थव्यवस्था के 2030 तक 3 ट्रिलियन डॉलर को पार करने का अनुमान है। भारत जैसे देशों के लिए यह केवल आर्थिक विकास नहीं, बल्कि आर्थिक संप्रभुता का मार्ग है।
दोहन से संरक्षण तक: एक वैचारिक पुनर्जागरण
आज का युग समुद्र से केवल संसाधनों के ‘दोहन’ का नहीं, बल्कि उसके ‘उपचार’ (Healing) का है। भारत ने दुनिया को दिखाया है कि विकास और पर्यावरण संरक्षण साथ-साथ चल सकते हैं। तमिलनाडु के समुद्री शैवाल (Seaweed) खेती के केंद्रों से लेकर हमारे विशाल मैंग्रोव संरक्षण परियोजनाओं तक, भारत प्रकृति-आधारित समाधानों में अग्रणी है। समुद्री शैवाल न केवल कार्बन डाइऑक्साइड को सोखकर ‘नीले फेफड़ों’ का कार्य करते हैं, बल्कि करोड़ों तटीय परिवारों को स्थायी आजीविका भी प्रदान कर रहे हैं।
‘वसुधैव कुटुंबकम’ की समुद्री सिद्धि
17 जनवरी, 2026 को भारत एक नए समुद्री युग का नेतृत्व करने के लिए पूरी तरह सुसज्जित है। श्री अटल बिहारी वाजपेयी जी की सामरिक दूरदर्शिता और आधुनिक कानूनी प्रावधानों का यह अद्भुत संगम एक ‘ब्लू रेनेसां’ (नीली पुनर्जागरण) को जन्म दे रहा है। विकसित भारत @2047 के संकल्प के साथ, हम केवल एक नया कानून नहीं अपना रहे हैं, बल्कि अपनी भावी पीढ़ियों के लिए एक समृद्ध, स्वच्छ और सुरक्षित महासागर की विरासत छोड़ रहे हैं। यह ‘वसुधैव कुटुंबकम’ के उस महान दर्शन की सिद्धि है, जहाँ समस्त विश्व एक परिवार की तरह समुद्र की लहरों के माध्यम से एक-दूसरे की सुख-समृद्धि से जुड़ा है।
लेखक: डॉ. अनिल प्रताप सिंह
संस्थापक, ग्लोबल साइंस एकेडमी, बस्ती, उत्तर प्रदेश स्टेट हेड, मुंसिफ टीवी, उत्तर प्रदेश ईमेल:
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Author: Goa Samachar
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