अंतरराष्ट्रीय समुद्री संगठन IMO में भारतः समुद्र पर नई पकड़
दुनिया का 90 प्रतिशत से अधिक व्यापार समुद्री मार्गों के माध्यम से होता है, जिससे समुद्र वैश्विक अर्थव्यवस्था की रीढ़ बन जाते हैं। दुनिया की लगभग 40 प्रतिशत आबादी तट से 100 किलोमीटर के भीतर रहती है. ऐसे में टिकाऊ समुद्री विकास में लोगों की भूमिका सबसे अहम है।
अनुषा केसरकर गवांकर
अंतरराष्ट्रीय समुद्री संगठन (IMO) की परिषद की श्रेणी–बी में 2026–27 के लिए भारत का दोबारा चुना जाना और उसमें भी अपने वर्ग में सबसे अधिक वोट हासिल करना, यह दिखाता है कि समुद्री क्षेत्र में भारत के नेतृत्व को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर लगातार पहचान मिल रही है. यह लगातार दूसरी बार है जब भारत ने अपने वर्ग में शीर्ष स्थान हासिल किया है. इससे भारत की गिनती जर्मनी, फ्रांस, कनाडा, संयुक्त अरब अमीरात, ऑस्ट्रेलिया, स्पेन, स्वीडन, नीदरलैंड और ब्राज़ील जैसे प्रमुख समुद्री देशों के साथ होने लगी है. भारत को मिला समर्थन इस बात का संकेत है कि वैश्विक समुद्री शासन में भारत को एक जिम्मेदार, दूरदर्शी और भरोसेमंद आवाज़ के रूप में देखा जा रहा है.
IMO संयुक्त राष्ट्र की एक एजेंसी है जिसका उद्देश्य समुद्री यातायात को सुरक्षित और स्वच्छ बनाना तथा जहाजों से होने वाले प्रदूषण को कम करना है. यह संगठन सतत विकास लक्ष्यों (SDGs) के अनुरूप काम करता है. IMO की महासभा, जिसमें सभी सदस्य देश शामिल होते हैं, इसकी सर्वोच्च निर्णय लेने वाली संस्था है. यह हर दो वर्ष में बैठक कर कार्ययोजना, बजट को मंजूरी देती है और परिषद का चुनाव करती है. परिषद, महासभा की बैठकों के बीच संगठन के कामकाज को दिशा देती है.
श्रेणी–बी की सीट मिलने से भारत को जहाजों की सुरक्षा, डीकार्बोनाइजेशन (कार्बन उत्सर्जन में कमी), डिजिटल तकनीक और नाविकों के कल्याण जैसे अहम मुद्दों पर चर्चा को दिशा देने का अवसर मिलता है.
IMO परिषद में भारत की मौजूदगी यह दिखाती है कि वह एक जिम्मेदार वैश्विक समुद्री शक्ति के रूप में उभर रहा है, खासकर ग्लोबल साउथ के देशों के लिए क्षमता निर्माण और ज्ञान साझा करने में. जैसे-जैसे भारत अपने बंदरगाहों का विस्तार कर रहा है, जहाज निर्माण क्षमता बढ़ा रहा है और हरित लॉजिस्टिक्स को मज़बूत कर रहा है, वैश्विक निर्णय प्रक्रिया में उसकी भागीदारी यह सुनिश्चित करती है कि उसकी राष्ट्रीय प्राथमिकताएँ अंतरराष्ट्रीय नियम-आधारित व्यवस्था से मेल खाएँ और ग्लोबल साउथ की आवाज़ सुनी जाए.
जलवायु परिवर्तन से निपटना IMO के एजेंडे का एक प्रमुख हिस्सा है क्योंकि वैश्विक शिपिंग क्षेत्र 2050 तक नेट-ज़ीरो उत्सर्जन की दिशा में बढ़ रहा है. भारत का पुनः निर्वाचन उसे इस प्रक्रिया को आकार देने का अवसर देता है, साथ ही यह ज़ोर देने का भी कि डीकार्बोनाइजेशन प्रभावी, किफ़ायती और न्यायसंगत होना चाहिए-खासकर उन विकासशील देशों के लिए जिन पर नियमों का पालन करने का भारी खर्च पड़ता है.
भारत का अपना अनुभव इस तर्क को मजबूती देता है. वह यह दिखा सकता है कि कैसे नवाचार और लक्षित निवेश के ज़रिये जलवायु लक्ष्यों और विकास की ज़रूरतों के बीच संतुलन बनाया जा सकता है.
दुनिया का 90 प्रतिशत से अधिक व्यापार समुद्री मार्गों के माध्यम से होता है, जिससे समुद्र वैश्विक अर्थव्यवस्था की रीढ़ बन जाते हैं. भारत के लिए यह भूमिका और भी अहम है, क्योंकि उसका अधिकांश व्यापार समुद्र के रास्ते होता है. भारत जैसे-जैसे वैश्विक आपूर्ति शृंखलाओं का एक महत्वपूर्ण हिस्सा बन रहा है, वैसे-वैसे समुद्री लॉजिस्टिक्स, बंदरगाह विकास और जहाज निर्माण में उसकी भागीदारी तेज़ी से बढ़ रही है. सागरमाला जैसी योजनाएँ, नए बंदरगाहों का विकास और जहाज निर्माण क्षमता में विस्तार भारत को एक उभरती समुद्री शक्ति के रूप में स्थापित कर रहे हैं.
इस बदलती स्थिति में, केवल नियमों का पालन करना पर्याप्त नहीं है. भारत के लिए ज़रूरी है कि वह अंतरराष्ट्रीय स्तर पर नियम बनाने की प्रक्रिया में सक्रिय भूमिका निभाए. IMO जैसे मंचों पर भारत की भागीदारी यह सुनिश्चित करती है कि वैश्विक समुद्री नियम व्यावहारिक, संतुलित और विकासशील देशों की ज़रूरतों के अनुकूल हों. इससे न केवल भारत के हित सुरक्षित रहते हैं, बल्कि वैश्विक समुद्री व्यवस्था भी अधिक स्थिर, सुरक्षित और समावेशी बनती है.
दुनिया की लगभग 40 प्रतिशत आबादी तट से 100 किलोमीटर के भीतर रहती है. ऐसे में टिकाऊ समुद्री विकास में लोगों की भूमिका सबसे अहम है. जैसे-जैसे बंदरगाह शहरों के पास फैलते हैं, स्थानीय समुदायों पर पर्यावरणीय और सामाजिक दबाव बढ़ता है. मछुआरे, असंगठित कामगार, महिलाएँ और प्रवासी श्रमिक अक्सर सबसे ज़्यादा प्रभावित होते हैं.
IMO परिषद में भारत का पुनः निर्वाचन उसकी बढ़ती क्षमता और समुद्री क्षेत्र में उसकी अहम भूमिका को दर्शाता है, खासकर ऐसे समय में जब विकासशील देश वैश्विक नियम निर्माण में अधिक आवाज़ चाहते हैं. यह अवसर भारत को समुद्री और महासागर शासन के भविष्य को दिशा देने का मौका देता है. आने वाले दो वर्षों में भारत सहयोग बढ़ाने, क्षेत्रीय साझेदारियाँ गहरी करने, ज्ञान साझा करने और एक सुरक्षित, टिकाऊ व समावेशी समुद्री व्यवस्था को आगे बढ़ाने में अहम भूमिका निभा सकता है. (आलेख साभार : ओआरएफ )
Author: Goa Samachar
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