कतार में है नितीश कुमार , प्रशांत किशोर, चिराग पासवान और तेजस्वी यादव

बिहार की राजनीति में इन दिनों प्रशांत किशोर सक्रिय भूमिका निभा रहे हैं। वे ‘सु-राज पार्टी’ के संस्थापक के तौर पर प्रदेश में पदयात्रा कर रहे हैं और जनसंवाद के माध्यम से लोगों से सीधे जुड़ने का प्रयास कर रहे हैं। हालांकि उनका यह प्रयास नया नहीं है — भारतीय राजनीति में जनसंपर्क और ज़मीनी स्तर पर पहुँच बनाने की यह शैली पहले भी अपनाई जा चुकी है।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी एक समय बीजेपी के एक सामान्य कार्यकर्ता के रूप में देश के कोने-कोने की यात्रा कर चुके हैं। उन्होंने संगठन की जड़ों तक जाकर काम किया और जनता से प्रत्यक्ष संवाद बनाकर खुद को एक जननेता के रूप में स्थापित किया। उनकी राजनीतिक यात्रा बेहद प्रेरणादायक रही है — एक सामान्य स्वयंसेवक से लेकर देश के सर्वोच्च पद तक पहुँचने का उनका सफर, मेहनत, दूरदृष्टि और रणनीतिक कौशल का उदाहरण है। नरेंद्र मोदी ने न सिर्फ पार्टी संगठन को मज़बूत किया बल्कि एक करिश्माई नेता के तौर पर जनमानस पर अमिट छाप छोड़ी।
इसी तरह, राहुल गांधी ने भी ‘भारत जोड़ो यात्रा’ के ज़रिए अपने तरीके से जनता से जुड़ने की कोशिश की। उन्होंने देश के विभिन्न हिस्सों की पदयात्रा कर जनसंवेदना को समझने और साझा करने की कोशिश की। हालांकि, उनकी यह यात्रा राजनीतिक रूप से कितनी सफल रही, इस पर विश्लेषकों की अलग-अलग राय रही है, लेकिन उन्होंने भी यह संकेत दिया कि राजनीति अब केवल भाषणों से नहीं, बल्कि जनता के बीच जाकर उनकी पीड़ा को समझने और संवाद स्थापित करने से चलेगी।
अब बात करें प्रशांत किशोर की, तो वे एक सफल राजनीतिक रणनीतिकार के तौर पर पहले से ही अपनी पहचान बना चुके हैं। कई राजनीतिक दलों और नेताओं की जीत में उनकी भूमिका अहम रही है। लेकिन अब जब उन्होंने खुद सियासी मैदान में उतरने का फैसला किया है और ‘सु-राज’ की परिकल्पना को लेकर जनजन तक पहुँचने की कोशिश कर रहे हैं, तो यह देखना दिलचस्प होगा कि वे एक रणनीतिकार से नेता के रूप में कैसे खुद को स्थापित करते हैं।
बेशक, नरेंद्र मोदी जैसा करिश्मा पैदा करना आसान नहीं है। उनका व्यक्तित्व, भाषण शैली, संगठन पर पकड़ और जनभावनाओं को समझने की क्षमता उन्हें बाकी नेताओं से अलग बनाती है। प्रशांत किशोर या राहुल गांधी जैसे नेता इस ऊँचाई को शायद ही जल्द पा सकें। लेकिन यह भी सही है कि लोकतंत्र में हर किसी को अपनी बात कहने, जनता तक पहुँचने और राजनीतिक विकल्प देने का पूरा अधिकार है।
कुल मिलाकर, प्रशांत किशोर की यात्रा एक नई राजनीतिक धारा की तलाश है। वे मोदी की तरह देशव्यापी करिश्मा भले ही ना पैदा कर पाएं, पर प्रयास करने में कोई बुराई नहीं है। लोकतंत्र में विविध मतों और नेताओं की उपस्थिति ही इसकी ताकत है। हो सकता है कि वे बिहार में एक नए विकल्प के रूप में उभरें या अपने विचारों से जनजागरण की कोई नई राह खोलें — लेकिन यह तय है कि राजनीति में प्रयास ही बदलाव की पहली सीढ़ी है।
बिहार में अगले विधानसभा चुनाव 2025 में होने हैं और इसकी तैयारियाँ शुरू हो चुकी हैं। राज्य की 243 विधानसभा सीटों के लिए चुनाव इसी वर्ष के अंत तक कराए जाने की संभावना है। चुनाव आयोग की ओर से आधिकारिक घोषणा भले ही अभी नहीं हुई है, लेकिन जानकारों का मानना है कि मतदान प्रक्रिया अक्टूबर या नवंबर 2025 में आयोजित की जा सकती है।
गौरतलब है कि वर्तमान मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के नेतृत्व वाली सरकार का कार्यकाल 22 नवंबर 2025 को समाप्त हो रहा है। संवैधानिक व्यवस्था के अनुसार, नई विधानसभा के गठन और नई सरकार के शपथ ग्रहण से पहले चुनाव प्रक्रिया पूरी कर ली जानी चाहिए। इस वजह से यह तय माना जा रहा है कि नवंबर से पहले सभी चरणों में मतदान संपन्न कर लिए जाएंगे और नई सरकार का गठन तय समयसीमा में होगा।
बिहार की राजनीति हमेशा से ही गतिशील और विविधतापूर्ण रही है। पिछले कुछ वर्षों में सत्ता में कई बदलाव देखने को मिले हैं। नीतीश कुमार, जो लंबे समय से राज्य की राजनीति के केंद्र में रहे हैं, कई बार महागठबंधन और एनडीए के बीच गठबंधन बदलते रहे हैं। इन राजनीतिक बदलावों ने न केवल बिहार की राजनीतिक दिशा को प्रभावित किया है, बल्कि मतदाताओं की सोच को भी काफी हद तक बदला है।
इस बार के चुनाव में एक बार फिर से बड़े राजनीतिक दलों के साथ-साथ नए चेहरों और दलों की भी परीक्षा होगी। सभी प्रमुख दल—जैसे कि जनता दल (यूनाइटेड), भारतीय जनता पार्टी, राष्ट्रीय जनता दल, कांग्रेस और अन्य क्षेत्रीय पार्टियाँ—अपनी रणनीतियाँ तैयार करने में जुटी हैं। सभी की निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि राज्य में अगली सरकार किसकी बनेगी।
चुनाव की घोषणा होते ही आचार संहिता लागू हो जाएगी और राज्य में राजनीतिक हलचल और भी तेज हो जाएगी। बड़े नेताओं की रैलियाँ, घोषणापत्र जारी करना, जातीय समीकरणों को साधने की कोशिश और युवाओं, किसानों, महिलाओं जैसे वर्गों को अपने पक्ष में करने की दौड़ शुरू हो जाएगी। साथ ही, चुनाव आयोग की निगरानी में निष्पक्ष चुनाव कराने की पूरी कोशिश की जाएगी।
बिहार के मतदाता पिछले कुछ दशकों से बहुत ही जागरूक और निर्णायक भूमिका निभाते आ रहे हैं। वे अक्सर अपने मुद्दों—जैसे विकास, बेरोज़गारी, शिक्षा, स्वास्थ्य, कानून-व्यवस्था—को ध्यान में रखते हुए वोट करते हैं। ऐसे में सभी दलों के लिए जरूरी होगा कि वे ज़मीनी मुद्दों पर बात करें और जनता का विश्वास जीतें।
संक्षेप में कहा जा सकता है कि बिहार विधानसभा चुनाव 2025 एक बार फिर से राज्य की राजनीति के लिए निर्णायक मोड़ साबित हो सकते हैं। वर्तमान सरकार का कार्यकाल समाप्त होने से पहले, यानी नवंबर 2025 से पहले, चुनाव कराए जाने तय हैं। अब देखना यह होगा कि कौन से दल जनता को अपने पक्ष में कर पाने में सफल होते हैं और कौन अगली सरकार के गठन की ओर बढ़ता है।
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Author: Goa Samachar
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