वास्को गोवा में ‘एक राष्ट्र एक चुनाव’ के समर्थन में अभियान चलाने वाला बना पहला निर्वाचन क्षेत्र

वास्को गोवा में एक राष्ट्र एक चुनाव के समर्थन में अभियान चलाने वाला बना पहला निर्वाचन क्षेत्र

वास्को गोवा में एक राष्ट्र एक चुनाव के समर्थन में अभियान चलाने वाला बना पहला निर्वाचन क्षेत्र

वास्को : ‘एक राष्ट्र एक चुनाव’ के समर्थन में वास्को के लोकप्रिय विधायक कृष्णा दाजी साल्कर ने जोरदार वकालत की है। इस तरह वास्को गोवा में एक राष्ट्र एक चुनाव के समर्थन में अभियान चलाने वाला पहला निर्वाचन क्षेत्र बन गया है।
वास्को के उत्साही युवाओं ने ड्राइवर हिल स्पोर्ट्स एंड कल्चरल क्लब के बैनर तले “एक राष्ट्र एक चुनाव” के लाभों के बारे में जागरूकता फैलाई। युवा स्वयंसेवकों ने सूचनात्मक पर्चे बांटे और सरकार से इस नीति को तत्काल लागू करने की जोरदार वकालत की। साथ ही उन्होंने बताया कि कैसे पूरे देश में एक साथ चुनाव कराने से राष्ट्रीय संसाधनों, जनशक्ति और वर्तमान में अलग-अलग चुनावों पर खर्च होने वाले हजारों करोड़ रुपये की बचत होगी। यह शक्तिशाली पहल राष्ट्र के लिए अधिक कुशल और संसाधनपूर्ण भविष्य के लिए उनकी प्रतिबद्धता को स्पष्ट रूप से प्रदर्शित करती है।
वास्को गोवा में एक राष्ट्र एक चुनाव के समर्थन में अभियान चलाने वाला पहला निर्वाचन क्षेत्र बन गया।

वास्को गोवा में 'एक राष्ट्र एक चुनाव' के समर्थन में अभियान चलाने वाला बना पहला निर्वाचन क्षेत्र
वास्को गोवा में ‘एक राष्ट्र एक चुनाव’ के समर्थन में अभियान चलाने वाला बना पहला निर्वाचन क्षेत्र

“एक राष्ट्र, एक चुनाव” के इस विचार को एक साथ चुनाव के रूप में भी जाना जाता है, जो लोकसभा और राज्य विधानसभाओं के चुनावों को एक ही साथ कराने का प्रस्ताव प्रस्तुत करता है। इससे मतदाता अपने निर्वाचन क्षेत्रों में एक ही दिन सरकार के दोनों स्तरों के लिए अपने मत डाल सकेंगे, हालाँकि देश भर में मतदान कई चरणों में कराया सकता है। इन चुनावी समय-सीमाओं को एक साथ जोड़ने के दृष्टिकोण का उद्देश्य चुनावों के लिए किए जाने वाले प्रबंध से जुड़ी चुनौतियों का समाधान करना, इसमें लगने वाले खर्च को घटाना और लगातार चुनावों के कारण कामकाज में होने वाले व्यवधानों को कम करना है।

वास्को गोवा में 'एक राष्ट्र एक चुनाव' के समर्थन में अभियान चलाने वाला बना पहला निर्वाचन क्षेत्र
वास्को गोवा में ‘एक राष्ट्र एक चुनाव’ के समर्थन में अभियान चलाने वाला बना पहला निर्वाचन क्षेत्र

 

 

भारत में एक साथ चुनाव कराने के संबंध में उच्च स्तरीय समिति की रिपोर्ट को 2024 में जारी किया गया था। रिपोर्ट ने एक साथ चुनाव के दृष्टिकोण को लागू करने के लिए एक व्यापक रूपरेखा प्रदान की। इसकी सिफारिशों को 18 सितंबर 2024 को केंद्रीय मंत्रिमंडल द्वारा स्वीकार किया गया, जो चुनाव सुधार की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है। इस प्रक्रिया के समर्थकों का तर्क है कि इस तरह की प्रणाली प्रशासनिक दक्षता को बढ़ा सकती है, चुनाव संबंधी खर्चों को कम कर सकती है और नीति संबंधी निरंतरता को बढ़ावा दे सकती है। भारत में शासन को सुव्यवस्थित करने और लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं को उसके अनुकूल बनाने करने की आकांक्षाओं को देखते हुए “एक राष्ट्र, एक चुनाव” की अवधारणा एक महत्वपूर्ण सुधार के रूप में उभरी है जिसके लिए गहन विचार-विमर्श और आम सहमति की आवश्यकता है।
एक साथ चुनाव कराने की अवधारणा भारत में नयी नहीं है। संविधान को अंगीकार किए जाने के बाद, 1951 से 1967 तक लोकसभा और सभी राज्य विधानसभाओं के चुनाव एक साथ आयोजित किए गए थे। लोकसभा और राज्य विधानसभाओं के पहले आम चुनाव 1951-52 में एक साथ आयोजित किए गए थे। यह परंपरा इसके बाद 1957, 1962 और 1967 के तीन आम चुनावों के लिए भी जारी रही।

हालाँकि, कुछ राज्य विधानसभाओं के समय से पहले भंग होने के कारण 1968 और 1969 में एक साथ चुनाव कराने में बाधा आई थी। चौथी लोकसभा भी 1970 में समय से पहले भंग कर दी गई थी, फिर 1971 में नए चुनाव हुए। पहली, दूसरी और तीसरी लोकसभा ने पांच वर्षों का अपना कार्यकाल पूरा किया। जबकि, आपातकाल की घोषणा के कारण पांचवीं लोकसभा का कार्यकाल अनुच्छेद 352 के तहत 1977 तक बढ़ा दिया गया था। इसके बाद कुछ ही, केवल आठवीं, दसवीं, चौदहवीं और पंद्रहवीं लोकसभाएं अपना पांच वर्षों का पूर्ण कार्यकाल पूरा कर सकीं। जबकि छठी, सातवीं, नौवीं, ग्यारहवीं, बारहवीं और तेरहवीं सहित अन्य लोकसभाओं को समय से पहले भंग कर दिया गया।

पिछले कुछ वर्षों में राज्य विधानसभाओं को भी इसी तरह की बाधाओं का सामना करना पड़ा है। विधानसभाओं को समय से पहले भंग किया जाना और कार्यकाल विस्तार बार-बार आने वाली चुनौतियां बन गए हैं। इन घटनाक्रमों ने एक साथ चुनाव के चक्र को अत्यंत बाधित किया, जिसके कारण देश भर में चुनावी कार्यक्रमों में बदलाव का मौजूदा स्वरूप सामने आया है।
भारत सरकार ने 2 सितंबर 2023 को पूर्व राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद की अध्यक्षता में एक साथ चुनाव कराने पर उच्च स्तरीय समिति का गठन किया था। इसका प्राथमिक उद्देश्य यह पता लगाना था कि लोकसभा और राज्य विधानसभाओं के लिए एक साथ चुनाव कराना कितना उचित होगा। समिति ने इस मुद्दे पर व्यापक स्तर पर सार्वजनिक और राजनीतिक प्रतिक्रियाएं मांगीं और इस प्रस्तावित चुनावी सुधार से जुड़े संभावित लाभों और इसकी चुनौतियों का विश्लेषण करने के लिए विशेषज्ञों से परामर्श किया। यह रिपोर्ट समिति के निष्कर्षों, संवैधानिक संशोधनों के लिए इसकी सिफारिशों और शासन, संसाधनों तथा जन-मानस पर एक साथ चुनाव के अपेक्षित प्रभाव का विस्तृत अवलोकन प्रस्तुत करती है।

जनता की प्रतिक्रिया: समिति को 21,500 से अधिक प्रतिक्रियाएँ प्राप्त हुईं, जिनमें से 80% एक साथ चुनाव कराने के पक्ष में थीं। प्रतिक्रियाएँ देश के सभी कोनों से आईं, जिनमें लक्षद्वीप, अंडमान और निकोबार, नागालैंड, दादरा और नगर हवेली शामिल हैं। सबसे अधिक प्रतिक्रियाएँ तमिलनाडु, महाराष्ट्र, कर्नाटक, केरल, पश्चिम बंगाल, गुजरात और उत्तर प्रदेश से प्राप्त हुईं।
राजनीतिक दलों की प्रतिक्रियाएँ: 47 राजनीतिक दलों ने इस विषय पर अपने विचार प्रस्तुत किए। इनमें से 32 दलों ने संसाधनों के सर्वोत्तम उपयोग और सामाजिक सद्भाव जैसे लाभों का हवाला देते हुए एक साथ चुनाव कराने का समर्थन किया। 15 दलों ने संभावित लोकतंत्र विरोधी प्रभावों और क्षेत्रीय दलों के हाशिए पर जाने से जुड़ी चिंताएं व्यक्त कीं।

https://hollywoodlife.com/feature/how-did-eugene-die-in-the-last-of-us-5381740/

https://goasamachar.in/archives/13875

Goa Samachar
Author: Goa Samachar

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